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करवा चौथ / Karva Chauth


अखंड सौभाग्य का प्रतीक करवा चौथ का व्रत हिन्दू पंचांग के अनुसार कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है. नामुराद पतियों की पूजा का यह पर्व लगभग सम्पूर्ण भारत में बड़े ही धूमधाम और हर्सोल्लास रूप से मनाया जाता है. इस शुभ दिवस पर विवाहित और सौभाग्यवती स्त्रियां अपने अटल सुहाग, पति की दीर्घ आयु और दांपत्य जीवन में मंगल कामना के लिए व्रत रखती है, जो कि सुख, सौभाग्य और संतान देनेवाला होता है. इस दिन महिलाएं बिना पानी तक पिए दिनभर उपवास रखती हैं और शाम के समय चन्द्रमा को अघ्र्य देती है और फिर उसे छलनी से देखती है. उसके बाद वे अपने पति के हाथ से पानी ग्रहण कर इस उपवास को पूर्ण करती है और उनके चरण को स्पर्श कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करती हैं.
यूं तो इस व्रत से सम्बंधित कई कथाएं प्रचलित हैं परन्तु पौराणिक शास्त्रों के अनुसार इसी दिन पांडवों की पत्नी द्रौपदी ने भगवान श्री कृष्ण के निर्देशानुसार व्रत रखा था और फलस्वरूप उन्हें शीघ्र ही पतिदेव अर्जुन के दर्शन हुए थे. इस महाव्रत के दिन भगवान शिव-पार्वती, स्वामी कार्तिकेय, विघ्नहर्ता श्री गणेश एवं चंद्रदेव का पूजन किया जाता है. इन देवताओं का पूजन करने से पहले सफ़ेद मिटटी की वेदी बनाकर उपरोक्त देवताओं को उसपर स्थापित किया जाता है. कहते हैं इस व्रत के सामान सौभाग्यदायक कोई भी दूसरा व्रत नहीं है.